Friday, January 29, 2021

यूरोपियनों का भारत आगमन

              यूरोपियनों का भारत आगमन

 यूरोपीय देशों का भारत के साथ प्राचीन काल से ही व्यापार होता था । यह व्यापार जल और स्थल दोनों मार्गों से होता था । समुद्री मार्गों में एक मार्ग फारस की खाड़ी से ईराक , तुर्की होते हुए वेनिस और जनेवा तक जाता था । दूसरा समुद्री मार्ग लाल सागर से एलेक्जेन्ड्रिया होते हुए पुनः समुद्र द्वारा वेनिस तक जाता था । स्थल मार्ग द्वारा यह व्यापार अफगानिस्तान , मध्य एशिया तथा रूस में बाल्टिक प्रदेशों को पार कर कुस्तुन्तुनिय से होता था । सिकन्दर द्वारा भारत पर आक्रमण करने के बाद भारत का यूनान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ । मानसून की जानकारी के बाद भारत और पश्चिम के व्यापार को बढ़ावा मिला । सम्राट आगस्टस के शासनकाल में भारत और रोम के व्यापार में प्रगति हुई । रोम में भारतीय वस्तुओं की अत्यधिक मांग थी । पश्चिमी व्यापार से भारत के व्यापारियों को खूब लाभ होता था । पश्चिमी देशों में भारतीय वस्त्र , रेशम , मलमल , गर्म मसाला , सुगन्धित द्रव्य , मोती तथा बहुमूल्य पत्थरों की अत्यधिक मांग थी ।  

         मध्यकाल  में भारत के समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था । पिछले अध्याय में तुम पढ़ चुकं हो कि सन् 1453 ई ० में कुस्तुन्तुनिया पर तुर्की का अधिकार हो गया । अत : पूर्व और पश्चिम के बीच होने वाले व्यापारिक मार्ग पर तुकों का अधिकार हो गया । अब इस मार्ग से अन्य देश व्यापार नहीं कर सकते थे । यूरोपीय व्यापारी भारत के साथ अपना व्यापार बन्द नहीं कर सकते थे , क्योंकि वहाँ की • वस्तुआ की यूरोप के बाजार में अत्यधिक मांग थी । इसके अतिरिक्त वे अरब व्यापारियों की मध्यस्थता नहीं चाहते थे । भारत को विशाल सम्पदा भी इनके आकर्षण का केन्द्र थी । वे पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष व्यापार करना चाहते थे ।

         पुर्तगालियों का आगमन - पुर्तगाल यूरोप का एक देश है । इस देश का 2/3 भाग पहाड़ों से घिरा है । इनकी आजीविका का मुख्य साधन अटलांटिक महासागर में मछलियाँ पकड़ना था । मछलियों की खोज में व अटलांटिक महासगर में दूर - दूर तक जाते रहते थे । पुर्तगाली नाविकों को समुद्र - यात्रा की जानकारी थी और वे इसके अभ्यस्त थे । इसलिये पुर्तगाल के शासकों के संरक्षण में भौगोलिक खोजों का आरंभ पुर्तगाल द्वारा ही किया गया । पुर्तगाल के बाद इस क्षेत्र में स्पेन में प्रवेश किया । इन देशों का मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्ग से भारत पहुँचना था । सन् 1492 ई ० में स्पेन के कोलम्बस ने भारत पहुँचने के लिये अपना अभियान शुरू किया , किन्तु वह अमेरिका ( सन् 1494 ई ० ) पहुँच गया । भारत में यूरोपीय जातियों में सर्वप्रथम पुर्तगाली पहुंचे । पुर्तगाल निवासी वास्कोडिगामा आशा - अन्तरीप होते हुए 27 मई , सन् 1498 ई ० को मालाबार तट पर स्थित कालीकट पहुँचा । यह मार्ग भारत पहुँचने का " केपमार्ग " कहलाता है । कालीकट के हिन्दू राजा जमारिन ने उसका स्वागत किया तथा पुर्तगालों को व्यापार करने की अनुमति दी । वास्कोडिगामा अपने जहाजों में भारत की वस्तुएँ भरकर ले गया । इस व्यापार से उसे 60 गुना लाभ हुआ । क्रवैल ने कालीकट तथा कोचीन में पुर्तगाली कारखानों की स्थापना की । 

      1502 ई ० में वास्कोडिगामा पुनः भारत आया । उसने कन्नानौर में एक अन्य कारखाना की स्थापना की तथा इन कारखानों की किलेबन्दी कर दी गई । अरब व्यापारियों के बहकावे में आकर जमेरिन ने पुर्तगालियों पर आक्रमण कर दिया , किन्तु वह इस युद्ध में पराजित हो गया । सन् 1505 ई ० तक पुर्तगाली व्यापारी भारत के पश्चिमी तट पर पहुंच गए । इस प्रकार भारत के समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का अधिकार हो गया । भारत में पुर्तगालियों द्वारा स्थापित की गई बस्तियों का प्रथम गर्वनर फ्रांसिस्को आल्मोडा  था । वह सन् 1506 ई ० से सन् 1509 ई ० तक इस पद पर रहा । उसने अरब व्यापारियों पर आक्रमण किया और उनके जहाजों को नष्ट कर दिया । सन् 1509 ई ० में उसकी हत्या कर दी गई । आल्मीडा के बाद *अल्युकर्क गर्वनर* बना । वह भारत में पुतगाल्नी साम्राज्य की स्थापना करना चाहता था । सन् 1510 ई ० में बीजापुर के सुल्तान को हराकर उसने गावा पर अधिकार कर लिया और गोवा को भारत स्थित पुर्तगाली साम्राज्य की राजधानी बनाया । गोवा पर पुर्तगाली अधिकार ने भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगाली प्रभुत्व की स्थापना कर दी । इस विजय के पूर्व व केवल व्यापारी थे , किन्तु अब व एक राजनीतिक शक्ति के रूप में परिवर्तित हो गए । इसका दूसरा परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में उन्होंने मलक्का तथा औरमीज पर भी अपना अधिकार कर लिया । हिन्द महासागर में पुर्तगालियों का वर्चस्व स्थापित हो गया । सन् 1515 ई ० में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई ।

     अल्बुकर्क के उत्तराधिकारियों ने उसकी नीति का अनुसरण किया । सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक उन्होंने भारत के माला तट , दामन , ड्यु , बेसीन तथा सालसेट पर अधिकार कर लिया । उन्होंने कोरामण्डल तट पर स्थित नीगापट्टम तथा सेन्ट थोम , बंगाल में हुगली , अराकान तथा चिटगाँव में भी अपनी व्यापारिक कोठियाँ बनाई। 

*डचों का आगमन* :

    पुर्तगालियों ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया था , किन्तु वे सफल नहीं हुए । शक्तिशाली मुगल शासकों का सामना करने में वे असमर्थ थे । पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्डवासी भारत पहुँचे । हॉलैण्ड का पूर्वी देशों के साथ सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध था । वे पुर्तगालियों से सामान खरीदकर यूराप क बाजार में बचते थे ।

     पुर्तगालिया का अनुसरण कर वे भी पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये पूर्वी सागर की ओर बढ़े । सन् 1602 ई ० में उन्होंने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की । वे पूर्वी देशों के मसालों के व्यापार में रूचि रखते थे । उन्होंने मलक्का , अम्बोयना आदि से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया । धीरे - धीरे पूर्वी द्वीप - समूह पर भी उनका अधिकार हो गया । भारत में भी उन्होंने सूरत , भराँच , पुलीकट , चिन्सुरा , कासिम बाजार , पटना , बागसोर , नीगापट्टम ( मद्रास ) अहमदाबाद .. कोचीन , मसूलीपट्टम ( आंध्र प्रदेश ) , आगरा आदि में अपनी बस्तियाँ स्थापित की । अंग्रेजों ने उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों पर अधिकार कर लिया । सन् 1759 ई ० तक डचों का प्रभाव समाप्त हो गया ।

 *भारत में अंग्रेजों का आगमन* - :

सन् 1588 ई ० में इंगलैण्ड ने स्पेन के जहाजी वेड़े को नष्ट कर दिया । इस विजय के बाद नौसेना के क्षेत्र में इंगलैण्ड यूरोप का सबसे शक्तिशाली देश बन गया । इंगलैण्ड के व्यापारी एशिया के साथ व्यापार करना चाहते थे । इंगलैण्ड के एक सौ व्यापारियों ने 31 दिसम्बर , सन् 1600 ई ० लन्दन में ' *ईस्टजहाजों को नष्ट कर दिया । सन् 1509 ई ० में उसकी हत्या कर दी गई । आल्मीडा के बाद *अल्युकर्क गर्वनर* बना । वह भारत में पुतगाल्नी साम्राज्य की स्थापना करना चाहता था । सन् 1510 ई ० में बीजापुर के सुल्तान को हराकर उसने गावा पर अधिकार कर लिया और गोवा को भारत स्थित पुर्तगाली साम्राज्य की राजधानी बनाया । गोवा पर पुर्तगाली अधिकार ने भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगाली प्रभुत्व की स्थापना कर दी । इस विजय के पूर्व व केवल व्यापारी थे , किन्तु अब व एक राजनीतिक शक्ति के रूप में परिवर्तित हो गए । इसका दूसरा परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में उन्होंने मलक्का तथा औरमीज पर भी अपना अधिकार कर लिया । हिन्द महासागर में पुर्तगालियों का वर्चस्व स्थापित हो गया । सन् 1515 ई ० में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई ।

 अल्बुकर्क के उत्तराधिकारियों ने उसकी नीति का अनुसरण किया । सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक उन्होंने भारत के माला तट , दामन , ड्यु , बेसीन तथा सालसेट पर अधिकार कर लिया । उन्होंने कोरामण्डल तट पर स्थित नीगापट्टम तथा सेन्ट थोम , बंगाल में हुगली , अराकान तथा चिटगाँव में भी अपनी व्यापारिक कोठियाँ बनाई। 

*डचों का आगमन* :

 पुर्तगालियों ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया था , किन्तु वे सफल नहीं हुए । शक्तिशाली मुगल शासकों का सामना करने में वे असमर्थ थे । पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्डवासी भारत पहुँचे । हॉलैण्ड का पूर्वी देशों के साथ सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध था । वे पुर्तगालियों से सामान खरीदकर यूराप क बाजार में बचते थे । 

पुर्तगालिया का अनुसरण कर वे भी पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये पूर्वी सागर की ओर बढ़े । सन् 1602 ई ० में उन्होंने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की । वे पूर्वी देशों के मसालों के व्यापार में रूचि रखते थे । उन्होंने मलक्का , अम्बोयना आदि से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया । धीरे - धीरे पूर्वी द्वीप - समूह पर भी उनका अधिकार हो गया । भारत में भी उन्होंने सूरत , भराँच , पुलीकट , चिन्सुरा , कासिम बाजार , पटना , बागसोर , नीगापट्टम ( मद्रास ) अहमदाबाद .. कोचीन , मसूलीपट्टम ( आंध्र प्रदेश ) , आगरा आदि में अपनी बस्तियाँ स्थापित की । अंग्रेजों ने उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों पर अधिकार कर लिया । सन् 1759 ई ० तक डचों का प्रभाव समाप्त हो गया ।

 *भारत में अंग्रेजों का आगमन* - सन् 1588 ई ० में इंगलैण्ड ने स्पेन के जहाजी वेड़े को नष्ट कर दिया । इस विजय के बाद नौसेना के क्षेत्र में इंगलैण्ड यूरोप का सबसे शक्तिशाली देश बन गया । इंगलैण्ड के व्यापारी एशिया के साथ व्यापार करना चाहते थे । इंगलैण्ड के एक सौ व्यापारियों ने 31 दिसम्बर , सन् 1600 ई ० लन्दन में ' *ईस्ट इंडिया कम्पनी "* की स्थापना की । इंगलैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने पन्द्रह वर्षों के लिये इस कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दिया । सन् 1609 ई ० में हॉकिन्स नामक व्यक्ति को इंगलैण्ड के राजा के राजदूत की हैसियत से जहाँगीर के दरबार में भेजा गया । उसने बादशाह जहाँगीर से सूरत में व्यापारिक " फैक्ट्री " खोलने का फरमान प्राप्त किया । पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण अंग्रेजों को इस सुविधा से वंचित होना पड़ा । सन् 1612 ई ० में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित कर दिया तथा सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा प्राप्त कर लो । अब धीरे - धीरे अंग्रेज भारत के आन्तरिक भागों में व्यापार करने लगे । सन् 1615 ई ० में अंग्रेज राजदूत सर अनुमति प्राप्त की । थोमस रो ने मुगल दरबार से आगरा , अहमदाबाद एवं भरौंच में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त की इंडिया कम्पनी "* की स्थापना की । इंगलैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने पन्द्रह वर्षों के लिये इस कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दिया । सन् 1609 ई ० में हॉकिन्स नामक व्यक्ति को इंगलैण्ड के राजा के राजदूत की हैसियत से जहाँगीर के दरबार में भेजा गया । उसने बादशाह जहाँगीर से सूरत में व्यापारिक " फैक्ट्री " खोलने का फरमान प्राप्त किया । पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण अंग्रेजों को इस सुविधा से वंचित होना पड़ा । सन् 1612 ई ० में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित कर दिया तथा सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा प्राप्त कर लो । अब धीरे - धीरे अंग्रेज भारत के आन्तरिक भागों में व्यापार करने लगे । सन् 1615 ई ० में अंग्रेज राजदूत सर अनुमति प्राप्त की । थोमस रो ने मुगल दरबार से आगरा , अहमदाबाद एवं भरौंच में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त की

Friday, January 22, 2021

औधोगिक क्रांति का अर्थ Industrial revolution

 Industrial revolution

       औधोगिक  क्रांति

औधोगिक क्रांति -: उत्पादन के क्षेत्र में हुए वे परिवर्तन, जिसमें मनुष्यों के स्थान पर मशीनों का अधिक प्रयोग आरम्भ हुआ । मशीनों की सहायता से कम समय में अत्यधिक वस्तुओं के उत्पादन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई।


पूंजीवाद का अर्थ किया है ? Did Capitalism Meaning ?

   Capitalism

पूंजीवाद -: वह आर्थिक पध्दति जिसमें उत्पादन और वितरण पर पूंजीपतियों का अधिकार होता है। पूंजीपतियों का उद्देश्य अधिक-से-अधिक लाभ कमाना होता है।

Thursday, January 21, 2021

समाजवाद

 समाजवाद :

 औद्योगिक क्रांति के बाद पूँजीपतियों ने मजदूरों का शोषण करना आरम्भ कर दिया । वे इनसे अधिक काम लेते थे , किन्तु इनको बहुत कम मजदुरी दी जाती थी । स्त्रियों और बालकों से भी बहुत काम लिया जाता था । उनके आवास , उनकी शिक्षा , सुरक्षा , स्वास्थ्य आदि की ओर उद्योगपति ध्यान नहीं देते थे । धीरे - धीरे मजदूरों ने अपनी सुरक्षा के लिये अपना संगठन बनाया । ये संगठन “ मजदूर संघ ' कहलाए । मजदूर संगठन अपने अधिकारों की माँग करने लगे । फ्रांस की क्रांति ने समानता के अधिकार का प्रचार किया था । औद्योगिक क्रांति ने मजदूरों को असहाय बना दिया था । नए उद्योगों के लाभों से वे वंचित रहे । आर्थिक और सामाजिक समानता के बिना राजनीतिक समानता अधूरी थी । इन देशों की सरकारों के द्वारा मजदूरों के हितों की रक्षा के लिये कानून बनाए गए ।

उन्नीसवीं शताब्दी में पूँजीवाद की बुराइयों को समाप्त करने और आर्थिक एवं सामाजिक समानता की स्थापना के लिये कुछ दार्शनिकों और विचारकों ने यह माँग उठाई कि जमीन , कारखानें तथा उत्पादन के सभी साधनों पर जनता का स्वामित्व होना चाहिये । यह विचारधारा “ समाजवादी विचारधारा " कहलाती है । समाजवाद का अर्थ है - आर्थिक और राजनीतिक समानता की स्थापना करना । इसके साथ सामाजिक न्याय स्वतः जुड़ जाता है । इस विचारधारा को लोकप्रिय बनाने का श्रेय कार्ल मार्क्स तथा फ्रेडरिक एंगेल्स को प्राप्त है । दोनों घनिष्ठ मित्र थे और दोनों ने लगभग चालीस वर्षों तक साथ - साथ काम किया था । उनको विश्वास था कि पूँजीवाद के स्थान पर एक नई समाज - व्यवस्था - समाजवाद की स्थापना होगी । इस नई व्यवस्था में उत्पादन के समस्त साधनों पर समाज का सामूहिक स्वामित्व होगा । इन विचारकों के सिद्धान्त के आधार पर अनेक देशों में सामाजवादी संगठनों की स्थापना की गई । कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से प्रेरित प्रथम सफल क्रांति सन् 1917 ई ० में हुई । 7 नवम्बर , सन् 1917 ई ० को लेनिन के नेतृत्व में रूस में समाजवादी सरकार की स्थापना हुई । इस क्रांति के द्वारा सत्ता तथा आर्थिक उत्पादन के साधनों पर जनता का अधिकार हो गया रूस की सफल क्रांति के बाद अनेक देशों में समाजवादी संगठनों की स्थापना हुई। द्वितीय विश्वयुध्य के बाद यूरोप और एशिया के अनेक देशों में समाजवादी सरकारों की स्थापना की गई।  रूस की क्रांति ने पराधीन देशों के राष्ट्रीय आंदोलन को भी प्रभावित किया। इस तरह हम देखते हैं कि अठारहवीं उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दियों के विचारों, घटनाओं आदि ने विश्व के सभी देशों को प्रभावित किया । 



MD SHAHWAN SHAHIDI




Monday, January 18, 2021

साम्राज्यवाद

 साम्राज्यवाद : 

सोलहवीं - सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप के देशों ने व्यापार की प्रगति के लिए उपनिवेश की स्थापना की थी । एशिया के देशों के साथ व्यापार करने के लिये इन देशों के व्यापारियों ने व्यापारिक कम्पनियों की स्थापना की थी । वे एशिया के सामानों को यूरोप के बाजारों में ऊंचे दामों पर बेचते थे । सन् 1498 ई . में जब वास्कोडिगामा भारत आया था , लौटते समय वह अपने जहाज में भारत की वस्तुएँ तथा गर्म मसाला भरकर ले गया था । यूरोप के बाजार में इन वस्तुओं को बेचकर उसने 60 गुना लाभ कमाया । औद्योगिक क्रांति के बाद इनकी व्यापारिक नीति में परिवर्तन आया । अब वे एशिया और अफ्रीका में  अपने साम्राज्य का विस्तार करने लगे । कारखानों में वस्तुओं के उत्पादन के लिए अधिक से अधिक कच्चे माल की आवश्यकता थी । इसके साथ ही साथ कारखाना में तैयार किये गये सामानों को विक्री के लिये अधिक - से - अधिक बाजार की आवश्यकता थी । अठारहवीं शताब्दी तक यूरोप के देश शक्तिशाली हो चुके थे । उस समय एशिया और अफ्रीका के देशों की स्थिति यूरोप से काफी भिन्न थी । उनकी सेना इन व्यापारिक कम्पनियों की सेना का मुकाबला नहीं कर सकती थी । यहाँ की सरकारें कमजोर थीं । इन व्यापारिक कम्पनियों ने इनकी कमजोरियों से लाभ उठाया । वे इन देशों पर अधिकार करना चाहते थे । इन देशों के बाजारों पर अधिकार करने के लिये इन पर राजनीतिक अधिकार की स्थापना करना आवश्यक था । उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप के देशों ने एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देशों को अपने अधीन कर लिया । जिन देशों पर इन्होंने अधिकार नहीं किया , उनको आपस में बाँटकर , उनपर अपने - अपने प्रभाव क्षेत्रों की स्थापना की । इस तरह इन्होंने अपने - अपने साम्राज्य का विस्तार किया । साम्राज्यवाद का अर्थ है - अपने से भिन्न नस्ल और संस्कृति वाले देश पर राजनीतिक या आर्थिक प्रभुत्व की स्थापना करना । जैसे - जैसे उत्पादन - प्रणाली में परिवर्तन होता गया , यूरोपीय देशों में साम्राज्य विस्तार करने की प्रतिस्पद्धा बढ़ती गई । यूरोपवासियों के लिये ये उपनिवेश आर्थिक लाभ तथा राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक बन गए । वे साम्राज्य विस्तार और उसकी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहने लगे । उनकी इसी स्पर्धा के कारण दो विश्वयुद्ध हुए । प्रथम विश्वयुद्ध सन् 1914 ई ० से सन् 1918 ई ० के मध्य हुआ । इसमें जन - धन की क्षति हुई । इससे यूरोप के देश प्रभावित हुए । द्वितीय विश्वयुद्ध ( सन् 1939 ई ० से सन् 1945 ई ० ) के बाद यूरोप कमजोर पड़ने लगे । बीसवीं शताब्दी में अफ्रीका और एशिया के देशों में अपने - अपने राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिये संघर्ष आरम्भ हो गया । द्वितीय विश्वयुद्ध ने साम्राज्यवादी शक्तियों को कमजोर बना दिया । उपनिवेशों पर उनकी पकड़ ढाली पड़ गई । साम्राज्यवाद के विरूद्ध विश्व जनमत भी तैयार हो गया । अतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी देश स्वतंत्र हो गए । समाजवाद :  

औद्योगिक क्रांति के बाद पूँजीपतियों ने मजदूरों का शोषण करना आरम्भ कर दिया । वे इनसे अधिक काम लेते थे , किन्तु इनको बहुत कम जमदुरी दी जाती थी । स्त्रियों और बालकों से भी बहुत काम लिया जाता था । उनके आवास , उनकी शिक्षा , सुरक्षा , स्वास्थ्य आदि की ओर उद्योगपति ध्यान नहीं देते थे । धीरे - धीरे मजदूरों ने अपनी सुरक्षा के लिये अपना संगठन बनाया । ये संगठन " मजदूर संघ ' कहलाए । मजदूर संगठन अपने अधिकारों की मांग करने लगे । फ्रांस की क्रांति ने समानता के अधिकार का प्रचार किया था । औद्योगिक क्रांति ने मजदूरों को असहाय बना दिया था । नए उद्योगों के लाभों से वे चित रहे । आर्थिक और सामाजिक समानता के बिना राजनीतिक समानता अधूरी थी । इन देशों की सरकारों के द्वारा मजदूरों के हितों की रक्षा के लिये कानून बनाए गए ।

MD SHAHWAN SHAHIDI

औधोगिक क्रान्ति

 औद्योगिक क्रान्ति :

 यह तुम जान चुके हो कि व्यापार से यूरोप के राज्य अत्यन्त धनी हो गए थे । अतः आन्तरिक मांगों में निरन्तर वृद्धि हो रही थी । इसके अतिरिक्त अठारहवीं शताब्दी तक यूरोप के देशों ने अफ्रीका और एशिया के विभिन्न देशों पर भी अपना प्रभाव स्थापित कर लिया था । उनके लिये बाहर में भी बड़ा बाजार उपलब्ध था । बाजारों की मांगों को पूरा करने के लिये अधिक - से - अधिक वस्तुओं के उत्पादन करने की आवश्यकता थी । पूँजीपतियों ने बढ़ती हुई माँग की पूर्ति के लिये उत्पादन प्रणाली में सुधार को आवश्यक समझा , जिससे कम समय में ज्यादा उत्पादन किया जा सके । इनके नाम उपनिवेश थे । वे अपने उपनिवेशों से कच्चा माल मंगा सकते थे । सामान्य औजार और कारीगरों से अधिक से अधिक वस्तुओं का उत्पादन नहीं किया जा सकता था । अत : अठारहवीं शताब्दी में घरेलू उद्योगों का स्थान कारखाना प्रणाली ने ले लिया ।

 अठारहवीं शताब्दी में उत्पादन के क्षेत्र में परिवर्तन का आरम्भ इंगलैण्ड में हुआ । सन् 1733 ई ० में " जॉन के " नामक एक अंग्रेज ने कपड़ा बुनने के लिए " फ्लाइंग शटल " का आविष्कार किया । इस मशीन की सहायता से जुलाहे कम समय में अधिक वस्त्रों का उत्पादन करने लगे । सन् 1765 ई ० में जेम्स हारगोब्ज ने " स्पिनिंग जेनी " नामक मशीन का आविष्कार किया , जिसमें सूत कातने के लिए आठ तकलियाँ होती थी । स्पिनिंग जेनी द्वारा काता गया सूत कच्चा होता था और बुनते समय सूत टूट जाता था । इस कमी को दूर करने के लिये सन् 1769 ई ० में रिचर्ड आर्कराइट ने जल कर्जा से चलनेवाली मशीन का आविष्कार किया । इस मशीन का नाम वाटर फ्रेम था । इसमें बहुत से बेलन लगे होते थे । इस मशीन का प्रयोग करने के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता थी । कारखाना प्रणाली का जन्म इसी मशीन के कारण हुआ । इन आविष्कारों के कारण इंगलैण्ड में सूती वस्त्र के उत्पादन में खस वृद्धि हुई । धीरे - धीरे कोयला और लोहा उद्योग में भी परिवर्तन होने लगे । जेम्स वाट ने एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया जो भाप से चलती थी । उत्पादन के साधनों के इसी परिवर्तन को औद्योगिक क्रांति कहते हैं औद्योगिक क्रान्ति सर्वप्रथम इंगलैण्ड में हुई । इसके पास अच्छे बन्दरगाह थे । इंगलैण्ड में अनेक नदियाँ हैं । नदियों के निकट ही कोयले और लोहे की खानें थीं । पूँजीपतियों को मजदूर भी आसानी से प्राप हो जाते थे । सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप के अन्य देशों की जनसंख्या घट गई थी , किन्तु रंगलेप को जनसंख्या निरन्तर बढ़ रही थी । इसके पास उपनिवेश भी अन्य यूरोपीय देशों से अधिक थे इंगलैण्ड में शान्ति और व्यवस्था उत्तम थी । अत : औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम इंगलैण्ड में हुई । धीरे - धीरे इसका प्रसार पूरोप के अन्य देशों में भी हुआ । औद्योगिक क्रांति का प्रथम प्रभाव उत्पादन पर पड़ा । मशीनों की सहायता से कम समय में अधिक उत्पादन होने लगा । घरेलू उद्योग - धंधे नष्ट हो गए थे । लोग नौकरी की तलाश में कारखानों में आने लगे । औद्योगिक नगरों की स्थापना होने लगी । मजदूर का शोषण होने लगा । कारखानों की स्थापना के लिए अधिक पूँजी की आवश्यकता थी । अतः इस नयी व्यवस्था में पूँजीपति का उद्देश्य धन जुटाना और अधिक - से - अधिक लाभ कमाना रह गया । साम्राज्यवाद : सोलहवीं - सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप के देशों ने व्यापार की प्रगति के लिए उपनिवेश की स्थापना की थी । एशिया के देशों के साथ व्यापार करने के लिये इन देशों के व्यापारियों ने व्यापारिक कम्पनियों की

MD SHAHWAN SHAHIDI

Sunday, January 17, 2021

पूंजीवाद का उदय

 पूँजीवाद का उदय चौदहवीं शताब्दी से ही यूरोप में आन्तरिक , और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रगति हो रही थी । भौगोलिक खोजों से आन्तरिक , अन्तराज्यों तथा समुद्रपार के व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति हुई । यूरोप के व्यापारि ने अपने व्यापार से खूब लाभ कमाया । इन व्यापारियों के पास पूँजी एकत्रित होने लगी । इस पूँजी रे उन्होंने पुनः व्यापार में लगाया । इस प्रकार पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप में एक नई व्यवस्था का जन्म हुआ , जिसे " पूँजीवाद " कहते हैं । इस प्रणाली में पूँजीपति अपनी पूँजी को जमा करके नहीं सर्त है और न ही समस्त लाभ को अपने ऊपर खर्च करते हैं । उनका उद्देश्य इस पूँजी से अधिक - से - अधिक लाभ कमाना होता है । वे उन्हीं वस्तुओं का व्यापार करते थे , जिनकी बाजार में मांग होती थी । वस्तुओं का उत्पादन भी बाजार की मांग के अनुसार किया जाता था । पूँजीपति उन वस्तुओं को बाजार में बेचका लाभ कमाते थे । आरम्भ में यह लाभ व्यापार से प्राप्त मुनाफा होता था । अतः पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप में , जिस पूँजीवाद का विकास हुआ , उसे " व्यापारिक पूंजीवाद " कहा जाता है । पूंजीवाद का उदय मध्यकाल में सामन्ती प्रणाली में वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय आवश्यकताओं के लिये किया जाता था । इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं था । वस्तुओं की खरीद - बिक्री हाटों और मेलों में होती थी । अन्तर्गन्दीय व्यापार के विकास में धीरे - धीरे बाजारों के स्वरूप में परिवर्तन कर दिया । पूँजीवादी प्रणाली में बड़े बाजारों की आवश्यकता होती है । वस्तुओं का उत्पादन बाजार में बेचकर मुनाफा कमाना होता है । अधिक उत्पादन करने के लिये उत्पादन के साधनों में निरन्तर सुधार की आवश्यकता होती है । मध्यकाल में कारीगर अपने सामान्य औजारों से , परिवार के सदस्यों की सहायत से आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन करते थे । ये आवश्यकतानुसार कच्चा माल व्यापारियों से प्राप्त करते थे और तैयार की हुई वस्तुएँ उन्हें लौटाते थे । वे किसी के अधीन काम नहीं करते थे । तमह उत्पादन प्रणाली " रेलू प्रणाली " कहलाती थी । पूँजीवाद के विकास के साथ - साथ उत्पादन के तरीकों में परिवर्तन होने लगा । आरम्भ में पूँजीपति कारीगरों को कच्चा माल देकर उनसे वस्तुओं का निर्माण कराने लगे । तैयार की हुई वस्तुओं को बेचकर , जो लाभ होता था , वह पूँजीपति को ही मिलता था । कारीगरों को केवल अपने परिश्रम की मजदूरी मिलती थी । धीरे - धीरे कारखाना प्रणाली का जन्म हुआ । इससे पूँजीपति अधिक - से - अधिक कारीगरों को रखकर बाजार की मांग के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन कराने लगे । इस प्रणाली में उत्पादन के साधनों , कारखानों , मशीनों तथा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री कर पूँजीपतियों का अधिकार होता है । कारीगर वस्तुओं का उत्पादन करते थे और मालिकों से वेतन पाते थे । अब पूँजीपतियों ने अपने लाभों को अनेक उद्योगों में लगाना शुरू कर दिया । वे कारखानों में तैयार किए हुए सामानों को बाजार में बेचने लगे । फलतः " व्यापारिक पूँजीवाद " के स्थान पर “ीद्योगिक पंजीवाद " का जन्म हुआ । पूँजीवादी व्यवस्था ने यूरोप के समाज में दो नए वर्गों को जन्म दिया - पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग । इसका प्रभाव कृषि पर भी पड़ा । छोटे - छोटे किसान भूमिहीन हो गए । उनकी जमीन प्रभावशाली जमींदारों के हाथ में चली गई । वे शहरों में आकर कारखानों में काम करने लगे । शासन में पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ा ।

Wednesday, January 13, 2021

आधुनिक पुनर्जागरण से आप क्या समझते हैं ?

 पुनर्जागरण - नवजागरण या पुनर्जागरण का काल सन् 1350 ई ० से 1550 ई ० के बीच माना जाता है । यूरोप में आधुनिक युग का आरम्भ नवजागरण से माना जाता है । मध्यकाल में यूरोप के लोग सामन्ती प्रथा तथा ईसाई धर्म की रूढ़िवादिता से जकड़े हुए थे । इस युग में मनुष्य की स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं था । प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययनों ने मानववादी विचारधारा को जन्म दिया , जिसमें मनुष्य के जीवन और उसके सुख को महत्व दिया गया । धार्मिक क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्राचीन सरल सिद्धान्तों के प्रति बढ़ा । क्षेत्रीय भाषाओं में बाइबिल का वाद किया गया । चौदहवीं शताब्दी से ही प्राचीन आदर्शों तथा सिद्धान्तों का प्रभाव कला , साहित्य , विज्ञान - दर्शन तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ने लगा । पन्द्रहवीं शताब्दी में कला और बौद्धिक क्षेत्र में ये परिवर्तन दिखलाई देने लगे । यही बौद्धिक चेतना अथवा विचारों की चेतना पुनर्जागरण या नवजागरण कहलाती है । पुनर्जागरण का आरम्भ इटली में हुआ । इस आन्दोलन में लोगों को स्वतंत्र चिन्तन के लिए प्रेरित किया । अब यूरोपवासी तर्क और अनुसंधान द्वारा रूढ़िवादी विचारों तथा रीति - रिवाजों के विरुद्ध आवाज उठाने लगे । अनुसंधान तथा प्रयोगों का महत्व बढ़ा । अंग्रेज वैज्ञानिक रोजर बेकन ने ( सन् 1214 ई ० से सन् 1294 ई ० ) कहा कि अनुभव तथा प्रयोग द्वारा ही सच्चे ज्ञान और सत्य को जाना जा सकता है । यह नई पद्धति ही " वैज्ञानिक पद्धति " कहलाती है । वैज्ञानिक पद्धति आधुनिक विज्ञान और आविष्कारों की जननी बनी । इस प्रकार नवजागरण ने तर्क और विवेक की स्थापना की तथा मध्यकालीन धार्मिक विचारधाराओं और रूढ़िवादी परम्पराओं को समाप्त कर दिया । MD SHAHWAN SHAHIDI

आधुनिक भारत जिस में मौलिक अधिकार प्राप्त है

 पोप के प्रभाव को कम करना था । इस आन्दोलन से गजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई तथा व्यपार को प्रोत्साहन मिला । उपनिवोशों की स्थापना भौगोलिक खोजों में पुर्तगाल सबसे आगे था । सन् 1415 ई ० में सर्वप्रथम पुर्तगाल ने अफ्रीका के समुद्रतट स्थित सीट नामक स्थान पर अधिकार कर लिया । किसी यूरोपीय देश के द्वारा प्रथम बार अपने से भिन्न जाति , धर्म और संस्कृति के लोगों पर अधिकार किया गया । भिन्न प्रजाति पर राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व की स्थापना को ही उपनिवेश की स्थापना कहा जाता है । सन् 1498 ई ० में वास्कोडिगामा भारत पहुंचा । भारत में गोआ , दमन और ड्यु पर पुर्तगालियों ने अधिकार किया । इसके साथ - साथ अमोय तथा मालक्का पर भी उन्होंने अपना प्रभाव स्थापित किया । इस प्रकार यूरोप में उपनिवेशवाद का जन्म हुआ । उपनिवेश का अर्थ होता है , दूर के प्रदेशों तथा अपने से भिन्न जाति पर अधिकार करना और उन पर शासन करना । पुर्तगाल की तरह स्पेन ने भी दक्षिण अमेरिका के प्रदेशों पर अधिकार कर लिया तथा उपनिवेश की स्थापना को । वे फिलीपिन्स पर भी अधिकार करने में सफल हुए । धीरे - धीरे इंगलैण्ड , फ्रांस , हॉलैण्ड , इटली आदि देश भी भौगोलिक खोजों में सम्मिलित हो गए । उत्तरी अमेरिका में इंगलैण्ड तथा फ्रांस ने उपनिवेश स्थापित किए । इंगलैण्ड ने 13 बस्तियाँ बसाई तथा कनाडा और लूसियाना पर फ्रांस के उपनिवेशा ख्या नगरों पर के कुशल जनीति स्थापित हुए । स्थानीय कानून से क अर्थ विचारों इतिहास लए राज्यों य राज्यों स्त किया । जाओं को उपनिवेशों की लूट : नवीन खोजों का एकामत्र उद्देश्य था , व्यापारिक लाभ कमाना । पुर्तगाल ने गर्म मसालों तथा एशियाई व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया । स्पेन ने दक्षिणी अमेरिका के प्रदेशों का शोषण करना आरम्भ कर दिया । पुर्तगाल ने अफ्रीका के नीग्रो दासों का घृणित व्यापार करना आरम्भ कर दिया । स्पेन के दक्षिणी अमेरिका के मूल निवासियों को खदेड़ दिया और उनकी जमीन पर अधिकार कर लिया । इंगलैण्ड और फ्रांस ने भी उत्तरी अमेरिका में यही नीति अपनाई । यूरोप के लोग इन नए प्रदेशों में जाकर बसने लगे । उन्होंने वहाँ के लोगों को अपने अधीन कर लिया । स्पेन में दक्षिणी अमेरिका से सोना - चांदी आने लगा । स्पेन ने दक्षिणी अमेरिका के सोना - चांदी के खानों पर अधिकार कर लिया । थोड़े ही समय में स्पेन यूरोप का सबसे धनी देश बन गया । व्यापारिक प्रगति से इन देशों के व्यापारियों के पास पूँजी का संग्रह हुआ । इस पूँजी को उन्होंने अन्य उद्योगों में लगाया है । वे अपने - अपने उपनिवेशों से कच्चा माल मंगाने लगे । तैयार माल को इन उपनिवेशों में बेचने लगे । प्रशासनिक और अर्थिक क्षेत्र में उपनिवेशों पर इनका नियंत्रण बढ़ गया । अमेरिका का स्याता संगर्ष - इंगलैण्ड ने उत्तरी अमेरिका में 13 बस्तियाँ बसाई । इन उपनिवेशों के लोग इंगलैण्ड से आए थे । इन अंग्रेजों को वे अधिकार नहीं थे , जो इंगलैण्ड में अंग्रेजों को प्राप्त थे । वे लोग कारखानों की स्थापना नहीं कर सकते थे । यहाँ से इंगलैण्ड कच्चा माल मंगाता था तथा तैयार किया हुआ माल इन उपनिवेशों में भेजता था । उपनिवेशवासी अन्य देशों के साथ व्यापार नहीं कर सकते ये । अंग्रेज सरकार इनसे अनेक तरह का कर लेती थी । उन पर कर का बोझ बढ़ता गया । सरकारी नौकरियों में भी उन्हें ऊंचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता था । उपनिवेशवासी स्वतंत्रता के पुजारी थे । ये लोग यूरोप के प्रसिद्ध दार्शनिकों के सिद्धान्तों से प्रभावित थे । इन दार्शनिकों का विचार था कि मनुष्य को कुछ मौलिक अधिकार प्राप्त हैं , जिन्हें कोई भी सरकार नहीं छीन सकती है । अन्याय के विरुद्ध विरोध कारना ऐसा हो अधिकार था । इसी उद्देश्य से उपनिवेशों की एक सभा फिलाडेलफिया में आयोजित की गयी । 4 जुलाई , सन् 1776 ई ० को तेरह उपनिवेशों के प्रतिनिधियों ने सारे संसार के सामने " स्वतंत्रता की घोषणा " की । इस " घोषणा - पत्र " को जेफर्सन ने तैयार किया था । इन प्रतिनिधियों ने सभी उपनिवेशों को मिलाकर " संयुक्त राज्य अमेरिका " के नाम से एक नए राष्ट्र की स्थापना की घोषणा की । इस घोषणा के बाद जॉर्ज वाशिंगटन के नेतृत्व में उपनिवेशवासियों ने संघर्ष आरंभ कर दिया । यह युद्ध सन् 1776 ई ० से सन् 1783 ई ० तक चला । उपनिवेशवासी विजयी रहे । इस नए देश में लोकतंत्र की स्थापना की गई । जॉर्ज वाशिंगटन " संयुक्त राज्य अमेरिका " के प्रथम राष्ट्रपति बने । फास की राज्य - क्रांति सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का उदय हुआ । इन राज्यों में फ्रांस एक प्रमुख राज्य था । फ्रांस के शासक निरंकुश थे । उन पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं था । कानून बनाना , उनको लागू करना , निर्णय देना , सभी अधिकारियों को नियुक्त करना आदि अधिकार उसे प्राप्त थे । उसकी शक्ति पर किसी का अंकुश नहीं था । फ्रांस का समाज तीन वर्गों में बंटा हुआ था पादरी वर्ग , सामन्त वर्ग तथा साधारण वर्ग । पादरियों तथा सामन्तों को विशेष अधिकार प्राप्त थे । सर्वसाधारण वर्ग को कोई अधिकार नहीं था । सामन्तों के पास बड़ी - बड़ी जागीरें थीं । चर्च की जागीरें भी बड़ी - बड़ी थीं । किन्तु इन्हें कर नहीं देना पड़ता था । तीसरे वर्ग जिसमें किसान और मजदूर थे , करों के बोझ से दये हुए थे । मध्यम वर्ग को भी कोई अधिकार नहीं था । फ्रांस का शासक लुई सोलहयाँ अयोग्य था । राजा - रानी फिजूल खर्च करते थे । कई तरह के कानून थे तथा न्याय - प्रणाली दोषपूर्ण थी । जनता का असंतोष बढ़ रहा था । फ्रांस के दार्शनिकों के क्रांतिकारी विचारों ने जनता का मार्गदर्शन किया । उन्होंने अत्याचारी शासन का अन्त करने का निश्चय किया । जनता के प्रतिनिधियों ने अपने को फ्रांस की " राष्ट्रीय असेम्बली " के रूप में संगठित कर लिया । 14 जुलाई , सन् 1789 ई ० को पेरिस की जनता ने वैस्टाइल दुर्ग को तोड़ दिया । इस घटना के साथ ही क्रांति का आरम्भ हो गया । राष्ट्रीय - सभा ने " मनुष्य और नागरिक के अधिकारों " का घोषणा - पत्र पारित किया । इस घोषणा - पत्र में कहा गया कि " सभी मनुष्यों को जन्म में ही स्वतंत्रता तथा समानता के अधिकार जीवनभर के लिए प्राप्त हैं । " इस क्रांति ने फ्रांस में राजतंत्र का अन्त कर दिया और फ्रांसीसी गणराज्य की स्थापना हुई । इस क्रांति ने स्वतंत्रता , समानता और बन्धुव के सिद्धान्तों को लोकप्रिय बनाया । 14 जुलाई के दिन फ्रांस प्रतिवर्ष राष्ट्रीय दिवस मनाता है । अमेरिका और फ्रांस की राज्य - क्राति ने राष्ट्रीय , संगठन और लोकतंत्र की विचारधाराओं को लोकप्रिय बनाया । उन्नीसवीं शताब्दी में पोलैण्ड , यूनान , इटली तथा जर्मनी ने राष्ट्रीय एकता के लिए संघर्ष किया । उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में एशिया के देशों में इन क्रातियों के आदर्शों का प्रचार हुआ । वे विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष करने लगे । शब्दों के अर्थ : नवजागरण या पुनर्जागरण - सन् 1350 ई ० से सन 1550 ई ० के मध्य यूरोप के प्राचीन आदर्शों तथा साहित्य और दर्शन का पठन - पाठन लोकप्रिय हुआ । इससे मध्यकाल के रूढ़िवादी विचारों तथा रीति - रिवाजों की सत्यता को तर्क और प्रयोगों द्वारा परखा जाने लगा । विचारों के क्षेत्र में इस परिवर्तन को ही नवजागरण या पुनर्जागरण कहते हैं । राष्ट्रीय राज्य - समान संस्कृति , रीति - रिवाज , एक भाषा बोलनेवाले तथा एक निश्चित भू भाग में रहनेवाले लोग । उपनिवेश - अपने से भिन्न जाति पर आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव स्थापित करना ।

Friday, January 8, 2021

आधुनिक भारत 3

 और उसके सुख को महत्व दिया गया धार्मिक क्षेत्र में ईसाई धर्म के प्राचीन सरल सिद्धान्तों के प्रति आकर्ष । बढ़ा । क्षेत्रीय भाषाओं में बाइबिल का आवाद किया गया । चौदहवीं शताब्दी से ही प्राचीन आदर्शों तथा सिद्धान्तों का प्रभाव कला , साहित्य , विज्ञान - दर्शन तथा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ने लगा । पन्द्रहवीं शताब्दी में कला और बौद्धिक क्षेत्र में ये परिवर्तन दिखलाई देने लगे । यही बौद्धिक चेतना अथवा विचारों की चेतना पुनर्जागरण या नवजागरण कहलाती है । पुनर्जागरण का आरम्भ इटली में हुआ । इस आन्दोलन में लोगों को स्वतंत्र चिन्तन के लिए प्रेरित किया । अब यूरोपवासी तर्क और अनुसंधान के द्वारा रूढ़िवादी विचारों तथा रीति - रिवाजों के विरूद्ध आवाज उठाने लगे । अनुसंधान तथा प्रयोगों का महत्व बढ़ा । अंग्रेज वैज्ञानिक रोजर बेकन ने ( सन् 1214 ई ० से सन् 1294 ई ० ) कहा कि अनुभव तथा प्रयोग द्वारा ही सच्चे ज्ञान और सत्य को जाना जा सकता है । यह नई पद्धति ही " वैज्ञानिक पद्धति " कहलाती है । वैज्ञानिक पद्धति आधुनिक विज्ञान और आविष्कारों की जननी बनी । इस प्रकार नवजागरण ने तर्क और विवेक की स्थापना की तथा मध्यकालीन धार्मिक विचारधाराओं और रूढ़िवादी परम्पराओं को समाप्त कर दिया । भौगोलिबा खोजें - कुस्तुन्तुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो जाने से यूरोप का एशियाई देशों के साथ व्यापार बंद हो गया । इस वियज के कारण यूरोप से पूर्वी देशों को जानेवाले स्थल भाग पर अब तुर्को का अधिकार हो गया । भूमध्य सागर के मार्ग से होनेवाला व्यापार अरब व्यापारियों के माध्यम से होता था । यूरोप के व्यापारी जलमार्ग द्वारा एशियाई देशों के साथ व्यापार करना चाहते थे । यूरोप के नाविकों तथा नौचालकों ने एशिया के देशों में पहुँचने के लिये समुद्री मार्गों की खोज की । पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी ( सन् 1394 ई ० से सन् 1460 ई ० ) ने खोज यात्राओं को प्रोत्साहन दिया । स्पेन के शासकों ने भी खोज - यात्राओं में रूचि ली । हेनरी ने सुदृढ़ नावों का निर्माण कराया । कुतुबनुमा का आविष्कार इटली का प्रसिद्ध यात्री पाको पोलो कर चुका था । कुतुबनुमा के आविष्कार से खोज यात्राएँ सरल हो गई । स्पेन के राजा की आर्थिक सहायता से कोलम्बस ने पश्चिमी मार्ग से भारत पहुंचने का प्रयत्न किया । वह सन् 1492 ई ० में अपनी यात्रा पर निकला । सन् 1494 ई ० में वह एक नए देश में पहुंचा , जो अमेरिका के नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार कोलम्बस ने एक नए महाद्वीप की खोज की , जो अभी तक अज्ञात था । सन् 1498 ई ० में वास्कोडिगामा भारत पहुंचा । 16 वीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप के साहसिक नाविकों ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों की खोज की । व्यापारिक प्रगति - नयी खोजों के कारण यूरोप के देशों के व्यापार में बहुत वृद्धि हुई । इन खोजों से इनका भारत , दक्षिणी और उत्तरी अमेरिका , चीन , जापान , श्रीलंका , मसालों के द्वीप - समूह तथा अफ्रीका के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ । इससे विश्व की दूरी घट गई तथा सभी देश एक - दूसरे के निकट सम्पर्क में आने लगे । व्यापार के सिलसिले में वे पूर्वी देशों के ज्ञान - विज्ञान से परिचित हुए । यूरोप में नगरों की संख्या बढ़ी । ये नगर या तो व्यापारी मार्गों पर बसें थे या समुद्र और नदी के उन तटवर्ती स्थानों पर बसे हुए थे , जो व्यापार की दृष्टि से सुविधाजनक थे । इन नगरों की स्थापना व्यापारिक महत्व के कारण हुई , अत : नगरों में रहनेवाला व्यापारी समुदाय वहाँ का सबसे प्रमुख वर्ग बन गया । इन नगरों के स्वतंत्र वातावरण में नए विचारों , साहित्य तथा कला को प्रोत्साहन मिला । सामन्तों का महत्व घटने लगा । समाज और सरकार के व्यापारियों को उच्च पद प्राप्त हुए । इस प्रकार यूरोप के मध्यम वर्ग का उदय हुआ । धीरे - धीरे कुशल कारीगर , निर्माता तथा शिक्षित समुदाय भी इस वर्ग में सम्मिलित हो गया । यूरोप के समाज और राजनीति में मध्यम वर्ग का महत्व बढ़ने लगा । राष्ट्रीय राज्यों का उदय- मध्यकाल में यूरोप के राजाओं के हाथों में बहुत कम शक्ति थी । स्थानीय सामन्ती सरदार अत्यधिक शक्तिशाली बन गए थे । आर्थिक और सैनिक क्षेत्रों में राजाओं को इन सामन्तों पर निर्भर रहना पड़ता था । एक ही देश के एक प्रदेश के कायदे - कानून दूसरे प्रदेश के कायदे - कानून से भिन्न थे । राज्यों की सीमाएँ बदलती रहती थीं । मध्यकाल में " राष्ट्र " और " राष्ट्रीयता " के आधुनिक अर्थ से यूरोपवासी परिचित नहीं थे । क्षेत्रीय भाषाओं की साहित्यिक रचनाओं तथा पुनर्जागरण काल के नए विचारों से प्रभावित होकर एक निश्चित भू - भाग में रहनेवाले लोगों , जिनका अपना एक लम्बा और निश्चित इतिहास था , जो समान भाषा बोलते थे , ने अपने को एक राष्ट्र का नागरिक मानना शुरू कर दिया इन नए राज्यों को ही " राष्ट्रीय राज्य " कहा जाता है । यूरोप में इंगलैण्ड , फ्रांस , स्पेन , रूस आदि का उदय राष्ट्रीय राज्यों के रूप में हुआ । इन्होंने गोला , बारूद तथा मध्यम वर्ग की सहायता से सामन्तों की शक्ति को समाप्त किया । देश में व्यवस्था और शान्ति की स्थापना की तथा व्यापार को प्रोत्साहन दिया । इन राज्यों के राजाओं को अत्यधिक शक्ति प्राप्त थी । धर्म - सुधार आन्दोलन - आधुनिक यूरोप के निर्माण में धर्म - सुधार आन्दोलन का एक महत्वपूर्ण स्थान है । मध्यकाल के अन्त तक ईसाई धर्म में अनेक बुराइयाँ आ गयीं थी । पोप अपने आपको ईश्वर का प्रतिनिधि समझने लगा था । लोग उसके प्रत्येक आदेश का पालन करते थे । पापों से मुक्ति के लिये वह " क्षमा - पत्र " बेचता था । चर्च बुराइयों का अड्डा बन गया था । पोप राजनीतिक मामलों में भी हस्तक्षेप करता था । नवजागरण आन्दोलन ने अन्धविश्वासों को समाप्त कर दिया । लोग पोप और चर्च को संदेह की दृष्टि से देखने लगे । 16 वीं शताब्दी में जर्मनी के निवासी मार्टिन लूथर ने चर्च और पोप के भ्रष्टाचार के विरूद्ध आन्दोलन किया । इस आन्दोलन का उद्देश्य ईसाइयों के जीवन का नैतिक उत्थान करना और

आधुनिक भारत 2

 के नाम से जाना जाता है । यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने इससे लाभ उठाया और वे भारत से जाना जाता है । यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों ने इससे लाभ उठाया और वे भारत की राजनीति में हस्तक्षेप करने लगे । इन व्यापारियों में अंग्रेज व्यापारी , जो इंगलैंड से आए थे , भारत में अपना साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहे । अंग्रेजों की राजनीतिक प्रभुता की स्थापना के बाद हम उनके निकट सम्पर्क में आए । अंग्रेजी शिक्षा , पश्चिमी ज्ञान - विज्ञान के प्रसार तथा पाश्चात्य संस्कृति के सम्पर्क ने हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया । परिवर्तन की यह प्रक्रिया अठारहवीं शताब्दी के उतरार्द से आरम्भ हुई । अत : आधुनिक भारत का आरम्भ बिन्दु सन् 1757 ई ० से माना जाता है । आधुनिक शब्द का अर्थ है - वर्तमान । प्राचीन तथा मध्यकाल के इतिहास की घटनाओं से हमारा निकट का सम्पर्क नहीं है । इन कालों के भारत के इतिहास के अध्ययन के लिये हमें पुरातात्विक साधनों , पत्थरों पर ऑकत अभिलेखों , भवनों , मंदिरों , मस्जिदों , पुस्तकों तथा दस्तावेजों का सहारा लेना पड़ता है । आधुनिक काल की घटनाओं से हमारा अधिक निकट का सम्बन्ध है । भारत के आधुनिक काल का इतिहास लिखने के लिये अभिलेखागारों में सोत - सामग्रियाँ , सरकारी अभिलेख आदि को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखा गया है । इनके अतिरिक्त यूरोपीय और भारतीय इतिहासकारों की रचनाएँ भी आधुनिक भारत के इतिहास के अध्ययन की सामग्रियाँ हैं । पटना स्थित बिहार अभिलेखागार में तुम ईस्ट इंडिया कम्पनी तथा ब्रिटिश सरकार के अधीन बंगाल मुबा तथा भारत की प्रशासनिक , सामाजिक और आर्थिक नीतियों की जानकारी प्राप्त कर सकते हो । आज भी पूरे भारतवर्ष में अनेक व्यक्ति हैं जिन्होंने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया है । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए वे जीवित स्रोत हैं । ( क ) यूरोप में आधुनिक युग का आगमन आधुनिक भारत के इतिहास के अध्ययन के पूर्व यह जानना आवश्यक है कि ये कौन से मुख्य तत्व थे , जिनके कारण यूरोप में आधुनिक युग का आगमन संभव हो सका और जो आधुनिक भारत के निर्माण में सहायक सिद्ध हुए । यूरोप में तेरहवीं - चौदहवीं शताब्दियों में ही बौद्धिक , व्यापारिक , राजनीतिक आदि क्षेत्रों में परिवर्तन के लक्षण आरम्भ हो चुके थे । इन शताब्दियों में यूरोप में विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई , जिनमें धर्मशास्त्रों का अध्ययन प्राचीन आदर्शों के आधार पर किया जाने लगा । मध्यकाल में यूरोप में लगभग चार शताब्दियों तक ईसाइयों तथा मुसलमानों के बीच युद्ध हुए इन युद्धों में यूरोप के देश एशिया के सम्पर्क में आए । इस सम्पर्क से एशिया का ज्ञान - विज्ञान आदि यूरोप में फैला । अरब व्यापारियों से इनको चीन के बारूद , भारत की दशमलव प्रणाली , चीन की मुद्रण प्रणाली आदि की जानकारी हुई । इनके व्यापार में भी प्रगति हुई । सन् 1453 ई ० में कुस्तुन्तुनिया पर सल्जक तुकों का अधिकार हो गया । ये तुर्क लोग इस्लाम धर्म के अनुयायी थे । कुस्तुन्तुनिया पूर्वी रोमन सामान्य का प्रमुख केन्द्र था । यह विद्या का भी केन्द्र था । तुर्को के अधिकार के बाद कुस्तुन्तुनिया के विद्वान इटली के नगरों तथा यूरोप के अन्य देशों में चले गए । वे अपने साथ प्राचीन और रोमन और लैटिन ग्रन्थों को भी लेकर गए । यूरोप के विद्वान , जब इनके सम्पर्क में आए , तो उनमें नवजागरण आया । पुनर्जागरण - नवजागरण या पुनर्जागरण का काल सन् 1350 ई ० से 1550 ई ० के बीच माना जाता है । यूरोप में आधुनिक युग का आरम्भ नवजागरण से माना जाता है । मध्यकाल में यूरोप के लोग सामन्ती प्रथा तथा ईसाई धर्म की रूढ़िवादिता से जकड़े हुए थे । इस युग में मनुष्य की स्वतंत्रता का कोई मूल्य नहीं था । प्राचीन ग्रन्थों के अध्ययनों ने भानववादी विचारधारा को जन्म दिया , जिसमें मनुष्य के जीवन

आधुनिक भारत

 भारत और आधुनिक विश्व मानव के सामूहिक क्रियाकलापों के कारण समाज , अर्थ - व्यवस्था तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में निरंतर परिवर्तन होता रहता है । परिवर्तन की यह प्रक्रिया जब अधिक गतिशील होती है , उसके प्रभाव सभी क्षेत्रों में स्पष्ट पड़ने लगते हैं । ऐसी स्थिति में मानव सभ्यता एक युग से दूसरे युग में प्रवेश करती है । परिवर्तनों का आरम्भ पहले युग में अंतिम काल से होने लगता है । प्राचीन तथा मध्यकाल में परिवर्तन की गति मन्द थी , आधुनिक काल में परिवर्तन की गति तीव्र रही है । प्राचीन तथा मध्यकाल के अन्तर को स्पष्ट करनेवाले कारणों से तुम परिचित हो । कक्षा -6 तथा कक्षा -7 में तुम भारत के प्राचीन तथा मध्यकाल का इतिहास पढ़ चुके हो । इससे तुम्हें जानकारी मिल चुकी है कि पूर्व युगों में भी भारत का इतिहास अन्य देशों की घटनाओं तथा उनके सम्पकों से प्रभावित रहा है । भारत का आधुनिक काल का इतिहास , आधुनिक विश्व - इतिहास का ही एक अंग है । आधुनिक भारत पश्चिमी सम्पर्क का परिणाम है । भारत का प्राचीन काल से ही पश्चिमी देशों के साथ व्यापारिक सम्बन्ध था । सिकन्दर के आक्रमण के बाद तथा मौर्यवंश के शासन काल से पश्चिमी व्यापार में वृद्धि हुई । मध्यकाल में अरब के व्यापारियों के माध्यम से यह व्यापार होता था । सन् 1498 ई ० में पुर्तगालवासी वास्कोडिगामा भारत पहुंचा । लगभग एक सौ वर्षों तक भारत के यूरोपीय व्यापार पर पुर्तगालियों का एकाधिकार रहा । सन् 1526 ई ० में बाबर ने भारत में शक्तिशाली मुगल साम्राज्य की स्थापना की । सत्रहवीं शाताब्दी में यूरोप के विभिन्न देशों की व्यापारिक कम्पनियों ने भारत के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित किया । इस व्यापार से भारत में यूरोप से सोना - चाँदी लगा । यूरोप के बाजारों में भारत के गर्म मसाले , रेशम , सूती - वस्त्र , मखमल , मोती , सुगन्धित द्रव्य तथा बहुमूल्य पत्थरों की अत्यधिक मांग थी । वे सोना - चाँदी देकर इन वस्तुओं को खरीदते थे । सन् 1707 ई ० में औरंगजेब की मृत्यु हो गई । उसकी मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य तेजी से बिखरने लगा । औरंगजेब के बाद जो मुगल बादशाह गद्दी पर बैठा , उन्हें परवर्ती मुगल कहते हैं । परवर्ती मुगल काल के बादशाह दुर्बल थे । केन्द्रीय शासन कमजोर था । इनकी कमजोरियों के कारण ही अठारहवीं शताब्दी में हमारा देश अनेक टुकड़ों में बँट गया । उनमें कई प्रदेश लगभग स्वतंत्र हो गए । इस काल में दिल्ली के राज सिंहासन पर अनेक बादशाह गद्दी पर बैठे । केन्द्र में अस्थिरता की स्थिति बनी रही । सन् 1720 ई ० में मुहम्मद शाह बादशाह बना । मुहम्मद शाह ने सन् 1748 ई ० तक कुल 29 साल शासन किया । उसके काल में भी मुगल साम्राज्य का विघटन जारी रहा । धीरे - धीरे भारत में अनेक अर्द्ध - स्वतंत्र राज्यों का उदय हुआ जो मुगल बादशाह के प्रति केवल औपचारिक निष्ठा निभाते थे । इन राज्यों के शासक राज्य विस्तार के लिए परस्पर लड़ते रहते थे । वे ईर्ष्या और द्वेष के कारण भी आपस में लड़ते थे । इन संघर्षों ने राजनीतिक अराजकता को स्थिति उत्पन्न कर दी । शासन की कमजोरी से जनजीवन तथा सम्पत्ति असुरक्षित हो गई । भारत के इतिहास का यह काल ‌संक्मण काल या परिवर्तन काल

ek sadhu ne piyas bujhayi

दोस्तों यह कहानी है एक साधु और एक कवार लड़की की यह एक खौफनाक जंगल की दास्तान है जहां एक बढ़ा साधु अपनी झोंपड़ी में रहता था इस कहानी की असल श...