Friday, January 29, 2021

यूरोपियनों का भारत आगमन

              यूरोपियनों का भारत आगमन

 यूरोपीय देशों का भारत के साथ प्राचीन काल से ही व्यापार होता था । यह व्यापार जल और स्थल दोनों मार्गों से होता था । समुद्री मार्गों में एक मार्ग फारस की खाड़ी से ईराक , तुर्की होते हुए वेनिस और जनेवा तक जाता था । दूसरा समुद्री मार्ग लाल सागर से एलेक्जेन्ड्रिया होते हुए पुनः समुद्र द्वारा वेनिस तक जाता था । स्थल मार्ग द्वारा यह व्यापार अफगानिस्तान , मध्य एशिया तथा रूस में बाल्टिक प्रदेशों को पार कर कुस्तुन्तुनिय से होता था । सिकन्दर द्वारा भारत पर आक्रमण करने के बाद भारत का यूनान के साथ व्यापारिक सम्बन्ध स्थापित हुआ । मानसून की जानकारी के बाद भारत और पश्चिम के व्यापार को बढ़ावा मिला । सम्राट आगस्टस के शासनकाल में भारत और रोम के व्यापार में प्रगति हुई । रोम में भारतीय वस्तुओं की अत्यधिक मांग थी । पश्चिमी व्यापार से भारत के व्यापारियों को खूब लाभ होता था । पश्चिमी देशों में भारतीय वस्त्र , रेशम , मलमल , गर्म मसाला , सुगन्धित द्रव्य , मोती तथा बहुमूल्य पत्थरों की अत्यधिक मांग थी ।  

         मध्यकाल  में भारत के समुद्री व्यापार पर अरब व्यापारियों का एकाधिकार था । पिछले अध्याय में तुम पढ़ चुकं हो कि सन् 1453 ई ० में कुस्तुन्तुनिया पर तुर्की का अधिकार हो गया । अत : पूर्व और पश्चिम के बीच होने वाले व्यापारिक मार्ग पर तुकों का अधिकार हो गया । अब इस मार्ग से अन्य देश व्यापार नहीं कर सकते थे । यूरोपीय व्यापारी भारत के साथ अपना व्यापार बन्द नहीं कर सकते थे , क्योंकि वहाँ की • वस्तुआ की यूरोप के बाजार में अत्यधिक मांग थी । इसके अतिरिक्त वे अरब व्यापारियों की मध्यस्थता नहीं चाहते थे । भारत को विशाल सम्पदा भी इनके आकर्षण का केन्द्र थी । वे पूर्वी देशों के साथ प्रत्यक्ष व्यापार करना चाहते थे ।

         पुर्तगालियों का आगमन - पुर्तगाल यूरोप का एक देश है । इस देश का 2/3 भाग पहाड़ों से घिरा है । इनकी आजीविका का मुख्य साधन अटलांटिक महासागर में मछलियाँ पकड़ना था । मछलियों की खोज में व अटलांटिक महासगर में दूर - दूर तक जाते रहते थे । पुर्तगाली नाविकों को समुद्र - यात्रा की जानकारी थी और वे इसके अभ्यस्त थे । इसलिये पुर्तगाल के शासकों के संरक्षण में भौगोलिक खोजों का आरंभ पुर्तगाल द्वारा ही किया गया । पुर्तगाल के बाद इस क्षेत्र में स्पेन में प्रवेश किया । इन देशों का मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्ग से भारत पहुँचना था । सन् 1492 ई ० में स्पेन के कोलम्बस ने भारत पहुँचने के लिये अपना अभियान शुरू किया , किन्तु वह अमेरिका ( सन् 1494 ई ० ) पहुँच गया । भारत में यूरोपीय जातियों में सर्वप्रथम पुर्तगाली पहुंचे । पुर्तगाल निवासी वास्कोडिगामा आशा - अन्तरीप होते हुए 27 मई , सन् 1498 ई ० को मालाबार तट पर स्थित कालीकट पहुँचा । यह मार्ग भारत पहुँचने का " केपमार्ग " कहलाता है । कालीकट के हिन्दू राजा जमारिन ने उसका स्वागत किया तथा पुर्तगालों को व्यापार करने की अनुमति दी । वास्कोडिगामा अपने जहाजों में भारत की वस्तुएँ भरकर ले गया । इस व्यापार से उसे 60 गुना लाभ हुआ । क्रवैल ने कालीकट तथा कोचीन में पुर्तगाली कारखानों की स्थापना की । 

      1502 ई ० में वास्कोडिगामा पुनः भारत आया । उसने कन्नानौर में एक अन्य कारखाना की स्थापना की तथा इन कारखानों की किलेबन्दी कर दी गई । अरब व्यापारियों के बहकावे में आकर जमेरिन ने पुर्तगालियों पर आक्रमण कर दिया , किन्तु वह इस युद्ध में पराजित हो गया । सन् 1505 ई ० तक पुर्तगाली व्यापारी भारत के पश्चिमी तट पर पहुंच गए । इस प्रकार भारत के समुद्री व्यापार पर पुर्तगालियों का अधिकार हो गया । भारत में पुर्तगालियों द्वारा स्थापित की गई बस्तियों का प्रथम गर्वनर फ्रांसिस्को आल्मोडा  था । वह सन् 1506 ई ० से सन् 1509 ई ० तक इस पद पर रहा । उसने अरब व्यापारियों पर आक्रमण किया और उनके जहाजों को नष्ट कर दिया । सन् 1509 ई ० में उसकी हत्या कर दी गई । आल्मीडा के बाद *अल्युकर्क गर्वनर* बना । वह भारत में पुतगाल्नी साम्राज्य की स्थापना करना चाहता था । सन् 1510 ई ० में बीजापुर के सुल्तान को हराकर उसने गावा पर अधिकार कर लिया और गोवा को भारत स्थित पुर्तगाली साम्राज्य की राजधानी बनाया । गोवा पर पुर्तगाली अधिकार ने भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगाली प्रभुत्व की स्थापना कर दी । इस विजय के पूर्व व केवल व्यापारी थे , किन्तु अब व एक राजनीतिक शक्ति के रूप में परिवर्तित हो गए । इसका दूसरा परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में उन्होंने मलक्का तथा औरमीज पर भी अपना अधिकार कर लिया । हिन्द महासागर में पुर्तगालियों का वर्चस्व स्थापित हो गया । सन् 1515 ई ० में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई ।

     अल्बुकर्क के उत्तराधिकारियों ने उसकी नीति का अनुसरण किया । सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक उन्होंने भारत के माला तट , दामन , ड्यु , बेसीन तथा सालसेट पर अधिकार कर लिया । उन्होंने कोरामण्डल तट पर स्थित नीगापट्टम तथा सेन्ट थोम , बंगाल में हुगली , अराकान तथा चिटगाँव में भी अपनी व्यापारिक कोठियाँ बनाई। 

*डचों का आगमन* :

    पुर्तगालियों ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया था , किन्तु वे सफल नहीं हुए । शक्तिशाली मुगल शासकों का सामना करने में वे असमर्थ थे । पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्डवासी भारत पहुँचे । हॉलैण्ड का पूर्वी देशों के साथ सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध था । वे पुर्तगालियों से सामान खरीदकर यूराप क बाजार में बचते थे ।

     पुर्तगालिया का अनुसरण कर वे भी पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये पूर्वी सागर की ओर बढ़े । सन् 1602 ई ० में उन्होंने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की । वे पूर्वी देशों के मसालों के व्यापार में रूचि रखते थे । उन्होंने मलक्का , अम्बोयना आदि से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया । धीरे - धीरे पूर्वी द्वीप - समूह पर भी उनका अधिकार हो गया । भारत में भी उन्होंने सूरत , भराँच , पुलीकट , चिन्सुरा , कासिम बाजार , पटना , बागसोर , नीगापट्टम ( मद्रास ) अहमदाबाद .. कोचीन , मसूलीपट्टम ( आंध्र प्रदेश ) , आगरा आदि में अपनी बस्तियाँ स्थापित की । अंग्रेजों ने उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों पर अधिकार कर लिया । सन् 1759 ई ० तक डचों का प्रभाव समाप्त हो गया ।

 *भारत में अंग्रेजों का आगमन* - :

सन् 1588 ई ० में इंगलैण्ड ने स्पेन के जहाजी वेड़े को नष्ट कर दिया । इस विजय के बाद नौसेना के क्षेत्र में इंगलैण्ड यूरोप का सबसे शक्तिशाली देश बन गया । इंगलैण्ड के व्यापारी एशिया के साथ व्यापार करना चाहते थे । इंगलैण्ड के एक सौ व्यापारियों ने 31 दिसम्बर , सन् 1600 ई ० लन्दन में ' *ईस्टजहाजों को नष्ट कर दिया । सन् 1509 ई ० में उसकी हत्या कर दी गई । आल्मीडा के बाद *अल्युकर्क गर्वनर* बना । वह भारत में पुतगाल्नी साम्राज्य की स्थापना करना चाहता था । सन् 1510 ई ० में बीजापुर के सुल्तान को हराकर उसने गावा पर अधिकार कर लिया और गोवा को भारत स्थित पुर्तगाली साम्राज्य की राजधानी बनाया । गोवा पर पुर्तगाली अधिकार ने भारत के पश्चिमी समुद्र तट पर पुर्तगाली प्रभुत्व की स्थापना कर दी । इस विजय के पूर्व व केवल व्यापारी थे , किन्तु अब व एक राजनीतिक शक्ति के रूप में परिवर्तित हो गए । इसका दूसरा परिणाम यह हुआ कि कुछ ही वर्षों में उन्होंने मलक्का तथा औरमीज पर भी अपना अधिकार कर लिया । हिन्द महासागर में पुर्तगालियों का वर्चस्व स्थापित हो गया । सन् 1515 ई ० में अल्बुकर्क की मृत्यु हो गई ।

 अल्बुकर्क के उत्तराधिकारियों ने उसकी नीति का अनुसरण किया । सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक उन्होंने भारत के माला तट , दामन , ड्यु , बेसीन तथा सालसेट पर अधिकार कर लिया । उन्होंने कोरामण्डल तट पर स्थित नीगापट्टम तथा सेन्ट थोम , बंगाल में हुगली , अराकान तथा चिटगाँव में भी अपनी व्यापारिक कोठियाँ बनाई। 

*डचों का आगमन* :

 पुर्तगालियों ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने का प्रयास किया था , किन्तु वे सफल नहीं हुए । शक्तिशाली मुगल शासकों का सामना करने में वे असमर्थ थे । पुर्तगालियों के बाद हॉलैण्डवासी भारत पहुँचे । हॉलैण्ड का पूर्वी देशों के साथ सदियों से व्यापारिक सम्बन्ध था । वे पुर्तगालियों से सामान खरीदकर यूराप क बाजार में बचते थे । 

पुर्तगालिया का अनुसरण कर वे भी पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये पूर्वी सागर की ओर बढ़े । सन् 1602 ई ० में उन्होंने पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने के लिये यूनाइटेड डच ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना की । वे पूर्वी देशों के मसालों के व्यापार में रूचि रखते थे । उन्होंने मलक्का , अम्बोयना आदि से पुर्तगालियों को खदेड़ दिया । धीरे - धीरे पूर्वी द्वीप - समूह पर भी उनका अधिकार हो गया । भारत में भी उन्होंने सूरत , भराँच , पुलीकट , चिन्सुरा , कासिम बाजार , पटना , बागसोर , नीगापट्टम ( मद्रास ) अहमदाबाद .. कोचीन , मसूलीपट्टम ( आंध्र प्रदेश ) , आगरा आदि में अपनी बस्तियाँ स्थापित की । अंग्रेजों ने उनके द्वारा अधिकृत प्रदेशों पर अधिकार कर लिया । सन् 1759 ई ० तक डचों का प्रभाव समाप्त हो गया ।

 *भारत में अंग्रेजों का आगमन* - सन् 1588 ई ० में इंगलैण्ड ने स्पेन के जहाजी वेड़े को नष्ट कर दिया । इस विजय के बाद नौसेना के क्षेत्र में इंगलैण्ड यूरोप का सबसे शक्तिशाली देश बन गया । इंगलैण्ड के व्यापारी एशिया के साथ व्यापार करना चाहते थे । इंगलैण्ड के एक सौ व्यापारियों ने 31 दिसम्बर , सन् 1600 ई ० लन्दन में ' *ईस्ट इंडिया कम्पनी "* की स्थापना की । इंगलैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने पन्द्रह वर्षों के लिये इस कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दिया । सन् 1609 ई ० में हॉकिन्स नामक व्यक्ति को इंगलैण्ड के राजा के राजदूत की हैसियत से जहाँगीर के दरबार में भेजा गया । उसने बादशाह जहाँगीर से सूरत में व्यापारिक " फैक्ट्री " खोलने का फरमान प्राप्त किया । पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण अंग्रेजों को इस सुविधा से वंचित होना पड़ा । सन् 1612 ई ० में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित कर दिया तथा सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा प्राप्त कर लो । अब धीरे - धीरे अंग्रेज भारत के आन्तरिक भागों में व्यापार करने लगे । सन् 1615 ई ० में अंग्रेज राजदूत सर अनुमति प्राप्त की । थोमस रो ने मुगल दरबार से आगरा , अहमदाबाद एवं भरौंच में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त की इंडिया कम्पनी "* की स्थापना की । इंगलैण्ड की महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने पन्द्रह वर्षों के लिये इस कम्पनी को पूर्वी देशों के साथ व्यापार करने का एकाधिकार दिया । सन् 1609 ई ० में हॉकिन्स नामक व्यक्ति को इंगलैण्ड के राजा के राजदूत की हैसियत से जहाँगीर के दरबार में भेजा गया । उसने बादशाह जहाँगीर से सूरत में व्यापारिक " फैक्ट्री " खोलने का फरमान प्राप्त किया । पुर्तगालियों के षड्यंत्र के कारण अंग्रेजों को इस सुविधा से वंचित होना पड़ा । सन् 1612 ई ० में अंग्रेजों ने पुर्तगालियों को पराजित कर दिया तथा सूरत में फैक्ट्री स्थापित करने की आज्ञा प्राप्त कर लो । अब धीरे - धीरे अंग्रेज भारत के आन्तरिक भागों में व्यापार करने लगे । सन् 1615 ई ० में अंग्रेज राजदूत सर अनुमति प्राप्त की । थोमस रो ने मुगल दरबार से आगरा , अहमदाबाद एवं भरौंच में व्यापारिक कोठियाँ स्थापित करने की अनुमति प्राप्त की

No comments:

Post a Comment

ek sadhu ne piyas bujhayi

दोस्तों यह कहानी है एक साधु और एक कवार लड़की की यह एक खौफनाक जंगल की दास्तान है जहां एक बढ़ा साधु अपनी झोंपड़ी में रहता था इस कहानी की असल श...