साम्राज्यवाद :
सोलहवीं - सत्रहवीं शताब्दी में यूरोप के देशों ने व्यापार की प्रगति के लिए उपनिवेश की स्थापना की थी । एशिया के देशों के साथ व्यापार करने के लिये इन देशों के व्यापारियों ने व्यापारिक कम्पनियों की स्थापना की थी । वे एशिया के सामानों को यूरोप के बाजारों में ऊंचे दामों पर बेचते थे । सन् 1498 ई . में जब वास्कोडिगामा भारत आया था , लौटते समय वह अपने जहाज में भारत की वस्तुएँ तथा गर्म मसाला भरकर ले गया था । यूरोप के बाजार में इन वस्तुओं को बेचकर उसने 60 गुना लाभ कमाया । औद्योगिक क्रांति के बाद इनकी व्यापारिक नीति में परिवर्तन आया । अब वे एशिया और अफ्रीका में अपने साम्राज्य का विस्तार करने लगे । कारखानों में वस्तुओं के उत्पादन के लिए अधिक से अधिक कच्चे माल की आवश्यकता थी । इसके साथ ही साथ कारखाना में तैयार किये गये सामानों को विक्री के लिये अधिक - से - अधिक बाजार की आवश्यकता थी । अठारहवीं शताब्दी तक यूरोप के देश शक्तिशाली हो चुके थे । उस समय एशिया और अफ्रीका के देशों की स्थिति यूरोप से काफी भिन्न थी । उनकी सेना इन व्यापारिक कम्पनियों की सेना का मुकाबला नहीं कर सकती थी । यहाँ की सरकारें कमजोर थीं । इन व्यापारिक कम्पनियों ने इनकी कमजोरियों से लाभ उठाया । वे इन देशों पर अधिकार करना चाहते थे । इन देशों के बाजारों पर अधिकार करने के लिये इन पर राजनीतिक अधिकार की स्थापना करना आवश्यक था । उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप के देशों ने एशिया और अफ्रीका के अधिकांश देशों को अपने अधीन कर लिया । जिन देशों पर इन्होंने अधिकार नहीं किया , उनको आपस में बाँटकर , उनपर अपने - अपने प्रभाव क्षेत्रों की स्थापना की । इस तरह इन्होंने अपने - अपने साम्राज्य का विस्तार किया । साम्राज्यवाद का अर्थ है - अपने से भिन्न नस्ल और संस्कृति वाले देश पर राजनीतिक या आर्थिक प्रभुत्व की स्थापना करना । जैसे - जैसे उत्पादन - प्रणाली में परिवर्तन होता गया , यूरोपीय देशों में साम्राज्य विस्तार करने की प्रतिस्पद्धा बढ़ती गई । यूरोपवासियों के लिये ये उपनिवेश आर्थिक लाभ तथा राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक बन गए । वे साम्राज्य विस्तार और उसकी सुरक्षा के प्रति सतर्क रहने लगे । उनकी इसी स्पर्धा के कारण दो विश्वयुद्ध हुए । प्रथम विश्वयुद्ध सन् 1914 ई ० से सन् 1918 ई ० के मध्य हुआ । इसमें जन - धन की क्षति हुई । इससे यूरोप के देश प्रभावित हुए । द्वितीय विश्वयुद्ध ( सन् 1939 ई ० से सन् 1945 ई ० ) के बाद यूरोप कमजोर पड़ने लगे । बीसवीं शताब्दी में अफ्रीका और एशिया के देशों में अपने - अपने राष्ट्र को स्वतंत्र करने के लिये संघर्ष आरम्भ हो गया । द्वितीय विश्वयुद्ध ने साम्राज्यवादी शक्तियों को कमजोर बना दिया । उपनिवेशों पर उनकी पकड़ ढाली पड़ गई । साम्राज्यवाद के विरूद्ध विश्व जनमत भी तैयार हो गया । अतः द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद एशिया और अफ्रीका के लगभग सभी देश स्वतंत्र हो गए । समाजवाद :
औद्योगिक क्रांति के बाद पूँजीपतियों ने मजदूरों का शोषण करना आरम्भ कर दिया । वे इनसे अधिक काम लेते थे , किन्तु इनको बहुत कम जमदुरी दी जाती थी । स्त्रियों और बालकों से भी बहुत काम लिया जाता था । उनके आवास , उनकी शिक्षा , सुरक्षा , स्वास्थ्य आदि की ओर उद्योगपति ध्यान नहीं देते थे । धीरे - धीरे मजदूरों ने अपनी सुरक्षा के लिये अपना संगठन बनाया । ये संगठन " मजदूर संघ ' कहलाए । मजदूर संगठन अपने अधिकारों की मांग करने लगे । फ्रांस की क्रांति ने समानता के अधिकार का प्रचार किया था । औद्योगिक क्रांति ने मजदूरों को असहाय बना दिया था । नए उद्योगों के लाभों से वे चित रहे । आर्थिक और सामाजिक समानता के बिना राजनीतिक समानता अधूरी थी । इन देशों की सरकारों के द्वारा मजदूरों के हितों की रक्षा के लिये कानून बनाए गए ।
MD SHAHWAN SHAHIDI
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