पूँजीवाद का उदय चौदहवीं शताब्दी से ही यूरोप में आन्तरिक , और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रगति हो रही थी । भौगोलिक खोजों से आन्तरिक , अन्तराज्यों तथा समुद्रपार के व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति हुई । यूरोप के व्यापारि ने अपने व्यापार से खूब लाभ कमाया । इन व्यापारियों के पास पूँजी एकत्रित होने लगी । इस पूँजी रे उन्होंने पुनः व्यापार में लगाया । इस प्रकार पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप में एक नई व्यवस्था का जन्म हुआ , जिसे " पूँजीवाद " कहते हैं । इस प्रणाली में पूँजीपति अपनी पूँजी को जमा करके नहीं सर्त है और न ही समस्त लाभ को अपने ऊपर खर्च करते हैं । उनका उद्देश्य इस पूँजी से अधिक - से - अधिक लाभ कमाना होता है । वे उन्हीं वस्तुओं का व्यापार करते थे , जिनकी बाजार में मांग होती थी । वस्तुओं का उत्पादन भी बाजार की मांग के अनुसार किया जाता था । पूँजीपति उन वस्तुओं को बाजार में बेचका लाभ कमाते थे । आरम्भ में यह लाभ व्यापार से प्राप्त मुनाफा होता था । अतः पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप में , जिस पूँजीवाद का विकास हुआ , उसे " व्यापारिक पूंजीवाद " कहा जाता है । पूंजीवाद का उदय मध्यकाल में सामन्ती प्रणाली में वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय आवश्यकताओं के लिये किया जाता था । इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं था । वस्तुओं की खरीद - बिक्री हाटों और मेलों में होती थी । अन्तर्गन्दीय व्यापार के विकास में धीरे - धीरे बाजारों के स्वरूप में परिवर्तन कर दिया । पूँजीवादी प्रणाली में बड़े बाजारों की आवश्यकता होती है । वस्तुओं का उत्पादन बाजार में बेचकर मुनाफा कमाना होता है । अधिक उत्पादन करने के लिये उत्पादन के साधनों में निरन्तर सुधार की आवश्यकता होती है । मध्यकाल में कारीगर अपने सामान्य औजारों से , परिवार के सदस्यों की सहायत से आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन करते थे । ये आवश्यकतानुसार कच्चा माल व्यापारियों से प्राप्त करते थे और तैयार की हुई वस्तुएँ उन्हें लौटाते थे । वे किसी के अधीन काम नहीं करते थे । तमह उत्पादन प्रणाली " रेलू प्रणाली " कहलाती थी । पूँजीवाद के विकास के साथ - साथ उत्पादन के तरीकों में परिवर्तन होने लगा । आरम्भ में पूँजीपति कारीगरों को कच्चा माल देकर उनसे वस्तुओं का निर्माण कराने लगे । तैयार की हुई वस्तुओं को बेचकर , जो लाभ होता था , वह पूँजीपति को ही मिलता था । कारीगरों को केवल अपने परिश्रम की मजदूरी मिलती थी । धीरे - धीरे कारखाना प्रणाली का जन्म हुआ । इससे पूँजीपति अधिक - से - अधिक कारीगरों को रखकर बाजार की मांग के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन कराने लगे । इस प्रणाली में उत्पादन के साधनों , कारखानों , मशीनों तथा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री कर पूँजीपतियों का अधिकार होता है । कारीगर वस्तुओं का उत्पादन करते थे और मालिकों से वेतन पाते थे । अब पूँजीपतियों ने अपने लाभों को अनेक उद्योगों में लगाना शुरू कर दिया । वे कारखानों में तैयार किए हुए सामानों को बाजार में बेचने लगे । फलतः " व्यापारिक पूँजीवाद " के स्थान पर “ीद्योगिक पंजीवाद " का जन्म हुआ । पूँजीवादी व्यवस्था ने यूरोप के समाज में दो नए वर्गों को जन्म दिया - पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग । इसका प्रभाव कृषि पर भी पड़ा । छोटे - छोटे किसान भूमिहीन हो गए । उनकी जमीन प्रभावशाली जमींदारों के हाथ में चली गई । वे शहरों में आकर कारखानों में काम करने लगे । शासन में पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ा ।
आधुनिक भारत इस के अन्दर मैं भारत का इतिहास के लिखने की कोशिश की है और यह सब कुछ साठीक और साफ़ तारीखा से की गई है और वह अपने घर के लिए कुछ भी नहीं मैं चाहता हूं कि हमारे देश के बच्चों इस से पड़ने वाले और प्रभावशाली बन सके
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