Sunday, January 17, 2021

पूंजीवाद का उदय

 पूँजीवाद का उदय चौदहवीं शताब्दी से ही यूरोप में आन्तरिक , और अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में प्रगति हो रही थी । भौगोलिक खोजों से आन्तरिक , अन्तराज्यों तथा समुद्रपार के व्यापार में आश्चर्यजनक प्रगति हुई । यूरोप के व्यापारि ने अपने व्यापार से खूब लाभ कमाया । इन व्यापारियों के पास पूँजी एकत्रित होने लगी । इस पूँजी रे उन्होंने पुनः व्यापार में लगाया । इस प्रकार पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त तक यूरोप में एक नई व्यवस्था का जन्म हुआ , जिसे " पूँजीवाद " कहते हैं । इस प्रणाली में पूँजीपति अपनी पूँजी को जमा करके नहीं सर्त है और न ही समस्त लाभ को अपने ऊपर खर्च करते हैं । उनका उद्देश्य इस पूँजी से अधिक - से - अधिक लाभ कमाना होता है । वे उन्हीं वस्तुओं का व्यापार करते थे , जिनकी बाजार में मांग होती थी । वस्तुओं का उत्पादन भी बाजार की मांग के अनुसार किया जाता था । पूँजीपति उन वस्तुओं को बाजार में बेचका लाभ कमाते थे । आरम्भ में यह लाभ व्यापार से प्राप्त मुनाफा होता था । अतः पन्द्रहवीं शताब्दी में यूरोप में , जिस पूँजीवाद का विकास हुआ , उसे " व्यापारिक पूंजीवाद " कहा जाता है । पूंजीवाद का उदय मध्यकाल में सामन्ती प्रणाली में वस्तुओं का उत्पादन स्थानीय आवश्यकताओं के लिये किया जाता था । इसका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं था । वस्तुओं की खरीद - बिक्री हाटों और मेलों में होती थी । अन्तर्गन्दीय व्यापार के विकास में धीरे - धीरे बाजारों के स्वरूप में परिवर्तन कर दिया । पूँजीवादी प्रणाली में बड़े बाजारों की आवश्यकता होती है । वस्तुओं का उत्पादन बाजार में बेचकर मुनाफा कमाना होता है । अधिक उत्पादन करने के लिये उत्पादन के साधनों में निरन्तर सुधार की आवश्यकता होती है । मध्यकाल में कारीगर अपने सामान्य औजारों से , परिवार के सदस्यों की सहायत से आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन करते थे । ये आवश्यकतानुसार कच्चा माल व्यापारियों से प्राप्त करते थे और तैयार की हुई वस्तुएँ उन्हें लौटाते थे । वे किसी के अधीन काम नहीं करते थे । तमह उत्पादन प्रणाली " रेलू प्रणाली " कहलाती थी । पूँजीवाद के विकास के साथ - साथ उत्पादन के तरीकों में परिवर्तन होने लगा । आरम्भ में पूँजीपति कारीगरों को कच्चा माल देकर उनसे वस्तुओं का निर्माण कराने लगे । तैयार की हुई वस्तुओं को बेचकर , जो लाभ होता था , वह पूँजीपति को ही मिलता था । कारीगरों को केवल अपने परिश्रम की मजदूरी मिलती थी । धीरे - धीरे कारखाना प्रणाली का जन्म हुआ । इससे पूँजीपति अधिक - से - अधिक कारीगरों को रखकर बाजार की मांग के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन कराने लगे । इस प्रणाली में उत्पादन के साधनों , कारखानों , मशीनों तथा उत्पादित वस्तुओं की बिक्री कर पूँजीपतियों का अधिकार होता है । कारीगर वस्तुओं का उत्पादन करते थे और मालिकों से वेतन पाते थे । अब पूँजीपतियों ने अपने लाभों को अनेक उद्योगों में लगाना शुरू कर दिया । वे कारखानों में तैयार किए हुए सामानों को बाजार में बेचने लगे । फलतः " व्यापारिक पूँजीवाद " के स्थान पर “ीद्योगिक पंजीवाद " का जन्म हुआ । पूँजीवादी व्यवस्था ने यूरोप के समाज में दो नए वर्गों को जन्म दिया - पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग । इसका प्रभाव कृषि पर भी पड़ा । छोटे - छोटे किसान भूमिहीन हो गए । उनकी जमीन प्रभावशाली जमींदारों के हाथ में चली गई । वे शहरों में आकर कारखानों में काम करने लगे । शासन में पूंजीपतियों का प्रभाव बढ़ा ।

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